संस्कृति:पोला त्योहार को लेकर समूचे छत्तीसगढ़ में खासा उत्साह

Today36garh

रायपुर/बिलासपुर : कृषि प्रधान राज्य छत्तीसगढ़ के स्थानीय लोगों द्वारा बैल जोड़ी के पूजा अर्चना का त्योहार पोला बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है।प्रमुखतः यह त्योहार यहां के किसानों द्वारा मनाया जाता है, जिसमें किसान अपने बैल की पूजा करते हैं।

किसानी कार्य को अच्छा बनाने में मवेशियों का भी विशेष योगदान होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इन मवेशियों की पूजा की जाती है। पोला का त्यौहार उन्ही में से एक है, जिस दिन कृषक गाय, बैलों की पूजा करते है। यह पोला का त्यौहार विशेष रूप मनाया जाता है।

कब मनाया जाता है ?

पोला त्योहार भादो माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बैलों का श्रृंगार कर उनकी पूजा की जाती है। बच्चे मिट्टी के बैल चलाते हैं। इस दिन बैल दौड़ का भी आयोजन किया जाता है। और इस दिन में बैलो से कोई काम भी नहीं कराया जाता है। और घरों में महिलाएं व्यंजन बनाती हैं। बैल, धरती और अन्न को सम्मान देने के लिए पर्व मनाया जाता है। इसके लिए किसान बैलों की पूजा करते हैं। घरों में बच्चे मिट्टी से बने नंदी बैल और बर्तनों के खिलौनों से खेलते हैं। घरों में ठेठरी, खुरमी, गुड़-चीला, गुलगुल भजिया जैसे पकवान तैयार किए जाते हैं। गुड़हा, चीला, अनरसा, सोहारी, चौसेला, ठेठरी, खुरमी, बरा, मुरकू, भजिया, मूठिया, गुजिया, तसमई छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का भोग लगाया जाएगा। किसान गौ माता और बैलों को स्नान कराकर श्रृंगार करेंगे। सींग और खुर यानी पैरों में माहुर, नेल पॉलिश लगाएंगे, गले में घुंघरू, घंटी, कौड़ी के आभूषण पहनाकर पूजा करेंगे।

क्या है विशेषता

पोला पर्व पर ठेठरी-खुरमी जैसे पकवानों की खुशबू से महकने लगेंगे। किसान परिवार पूजा-अर्चना के लिए कृषि औजारों की सजावट और बैलों का श्रृंगार करते है। मिट्टी से बने खिलौने का इस दिन खास महत्व है। प्रदेश के पारंपरिक बर्तन, जिनमें लाल रंग का चूह्ला, हंड़िया, कुरेड़ा, गंजी, टीन, कड़ाही, जाता, सील-लोड़हा आदि शामिल हैं। पोला पर इन्हीं बर्तनों को छोटे आकार में तैयार किया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद बच्चे इससे खेलते हैं। वहीं इन खिलौनों को देवी-देवताओं को अर्पित करने की परंपरा भी है। पोरा पर्व मूल रूप से खेती-किसानी से जुड़ा है। खेती किसानी में बैल और गौ वंशीय पशुओं के महत्व को देखते गांवों में इस दिन बैलों को विशेष रूप से सजाया जाता है। उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। शीतला देवी समेत भैसासुर, ठाकुर देवता, मौली माता, साड़हा देवता, धारण देव, परेतिन दाई, बईगा बाबा, घसिया मसान, बधधरा, कचना धुर्वा, चितावर, सतबहिनी, राय देवता, घटोरिया, चिरकुटी मुनि, सियार देवता आदि को देवी-देवताओं को मिट्टी के बैल चढ़ाकर पूजा-अर्चना की जाएगी। घरों में बच्चे मिट्टी से बने नंदी बैल और बर्तनों के खिलौनों से खेलते हैं। सभी घरों में ठेठरी, खुरमी, गुड़-चीला, गुलगुल भजिया जैसे पकवान तैयार किए जाते हैं और उत्सव मनाया जाता है। बैलों की दौड़ भी इस अवसर पर आयोजित की जाती है। इस त्यौहार के मद्देनजर रायपुर और बिलासपुर के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी से बने बैलों के जोड़े बिक रहे हैं। इसको लेकर बच्चों में खास उत्साह है।

पोला पर्व की मान्यता

मान्यता है कि भगवान कृष्ण के बाल्यकाल में कंस ने कई असुरों को उन्हें मारने भेजा था। एक बार कंस ने पोलासुर नामक राक्षस को भेजा, जिसे भी कृष्ण ने मार दिया था। वह दिन भाद्रपद अमावस्या का था इसलिए इसे पोला कहा जाता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here